अब देर रात ऑफिस से घर आकर इंटरनेट मीडिया की जिम्मेदारी शायद बूढ़े मां बाप की जिम्मेदारी से बढ़कर हो गई है। हां, कमाने-खाने के तौर-तरीके जो बदल गए हैं। 'मैं तंग आ गया हूं, इस बदलती अपनों की दुनिया से अलग कब तक नौकरी के सहारे जिंदा रहूंगा ?' रामलाल ने एक गहरी सांस लेते हुए अपनी पत्नी शकुंतला से कहा। 'अरे आप परेशान न हो, मैं सब कुछ संभाल लूंगी।' शकुंतला बोली। तभी कमरे के अंदर से भाई खाना की दो थाली बूढ़े मां बाप को देखकर चली गई। दोनों ने एक दूसरे को देखा और फिर नजरें झुकाए भोजन करना शुरू कर दिया। भोजन समाप्ति के बाद ही बहू और बेटे का घर के अंदर प्रवेश हुआ। बेटा तो फिर भी खैरियत पूछ लेता है, परंतु बहु शायद ज्यादा ही आधुनिक है, तभी सीधे अपने कमरे में चली जाती है। 'कैसा खाना बना बाबू जी?' बेटे ने पूछा। 'खाना तो ठीक बना है, लेकिन अब गया है।' तभी कमरे से बाहर निकलती हुई बहु बोली, 'बाबू जी स्वाद का चला जाना तो कोरोना के लक्षण हो सकते हैं, चलो कल आपकी जांच कराते हैं।' 'ठीक है बहू, कल जाँच करा देना, अब तो स्वाद के साथ-साथ अपनापन भी चला गया है। किस-किस की जांच कराई जाएगी।' बाबूजी के शब्दों में खामोशी की लंबी दीवार खड़ी कर दी थी। खामोशी मैं पता ही नहीं चला कब बहू-बेटा अपने कमरे में चले गए और बाबू जी कल का इंतजार कर रहे थे।
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