स्मृतियों ने साथ न छोड़ा
मनबसियों ने साथ न छोड़ा
धुंधले हुए चित्र बचपन के
कौन सुनाएं परीकथाएं
ऐसी नींद नहीं आती अब
जिनमें फिर वह सपने आए
पर सपनों में जो आती थी
उन परियों ने साथ न छोड़ा
जीवन की आपाधापी में
जाने कितने साथी छूटे
जग में मनभावन उपवन के
छूटे कितने ही गुलबूटे
जिन की गंध बसी थी मन में
उन कलियों ने साथ न छोड़ा
यायावर हम निपट अकेले
रह पाए किस घर के हो के
चौखट ऐसी कोई नहीं थी
कर मनुहार हमें जो रोके
पर हम साथ जहां चलते थे
उन गलियों न साथ न छोड़ा
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