मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

सोनू का सपना

कहानी 


सोनू-मोनू के साथ आसमान में उड़ा जा रहा था। बादलों के बीच से गुजरते हुये वे निरंतर ऊपर चले जा रहे थे। ठंडी हवा सरसराकर उनके बगल से निकल जाती। उड़ते-उड़ते सोनू को मधुर संगीत की धीमी धुन सुनाई देने लगी। वे दोनों एक ऐसे स्थान पर उतर गये, जहां चमकीला नीला प्रकाश फैला हुआ था। वह स्थान बहुत सुदंर था। जगह-जगह इंद्रधनुषी रंग बिखरा हुआ था। श्यामल वर्ण के बादल के टुकड़े नृत्य करते से जान पड़ते थे। सोनू मोनू के साथ खड़ा एक अत्यंत सुन्दर पक्षी की ओर देख रहा था। उसने आज तक ऐसा सुंदर दृश्य नहीं देखा था। वह पक्षी अपने नीले पंखों को फैलाये हुये लाल रंग की चोंच खोले बहुत संुदर दिख रहा था। उसके मुंह से निकलती बांसुरी की सी मधुर ध्वनि सुनकर लगता था मानो वह किसी खास उद्देश्य से वृक्ष पर बैठे अपने साथियों को बुला रहा है। सामने खड़े वृक्ष के पत्ते नीलम के समान चमक रहे थे, उसमें खिले फूल सोने के समान दिखाई दे रहे थे और पेंड़ के ऊपर चार सुंदर पक्षी बैठे थे, जो मधुर ध्वनि निकाल रहे थे। आसपास ढेर सारे रंग बिरंगे फूल खिले थे, जिनके ऊपर तितलियां मंडरा रही थीं।
तभी मोनू कहती है 'सोनू, अब यही मेरी दुनिया है। ये ही मेरे साथी हेैं। मैं तुम्हें यहां इसलिए लाई हूं कि तुम देख सको कि तुम्हारी बहन कितनी खुश है। क्या तुम मुझे सदा खुश देखना पसंद नहीं करोगे? बोलो मेरे भैया, क्या तुम मुझे सदा खुश देखना पसंद करोगे?'
'सोनू, उठो ना, देखो तो दिन कितना निकल आया।' सोनू की मां उसको उठाते हुये बोली। सोनू हड़बड़ाकर बिस्तर से उठ बैठा चारों ओर आंखें फाड़-फाड़कर देखने लगा। फिर जोरों से चीख पड़ा- 'मोनू, तुम कहां हो? मुझे छोड़कर तू कहां चली गई मेरी बहना।'
सोनू की हरकत देखकर उसकी मां घबरा उठी। उसने अपने लाड़ले को बांहों में भर लिया। फिर आंखों में आंसू भरकर बोली-'तुम्हें क्या हो गया मेरे लाल? जब देखो, मोनू-मोनू पुकारते रहते हो। न ठीक से खाना खाते हो, न ठीक से सोते हो। जाने वाले कभी लौटकर नहीं आते बेटा।' यह कहते-कहते सोनू की मां भी रो पड़ी।
सोनू अब तक सामान्य हो चुका था। उसने मां को दुःखी देखा तो कहा- 'सुबह-सुबह एक सपना आ गया था मां।
नित्यकर्म से निवृत्त होकर सोनू आंगन में पड़ी कुर्सी पर गुमसुम बैठ गया। आज भी उसके दिल में खाने की इच्छा नहीं थी, परंतु मां के जोर डालने पर वह इंकार न कर सका ओर बेमन से खाने लगा।
बैठे-बैठे सोनू अतीत की यादों में खो गया। उसमें और मोनू में कितना प्यार था। उसका असली नाम सोहन था और उसकी प्यारी बहन का नाम मीना था। माता-पिता प्यार से दोनों को सोनू-मोनू कहकर पुकारते थे। मीना उससे दो वर्ष छोटी थी, जिसके कारण वे एक पल के लिए भी अलग रहना पसंद नहीं करते थे। मीना को बचपन से ही फूलों से बहुत प्यार था। अपने छोटे से आंगन में मीना ने ढेर सारे फूलों के पौधे लगा रखे थे। दोनो ंभाई-बहन पौंधों में पानी डाला करते थे। जब तितलियां उन फूलों के ऊपर मंडराया करतीं तो दोनांें बड़े प्यार से उन्हें देखा करते थे। अचानक एक दिन मीना बीमार पड़ गयी। पिताजी ने डाक्टर को दिखाया तो उसने टाइफाइड बताया और दवा दी। मीना के स्वास्थ्य में सुधार न होने पर पिताजी ने बड़े-बड़े डाक्टरों से मीना का इलाज कराया और बहुत पैसा खर्च किया, लेकिन मीना ठीक नहीं हुई और एक दिन पूरे परिवार को रोते-बिलखते छोड़कर सदा के लिये सो गई।
सोनू का रो-रोकर बुरा हाल था। कई दिन तक उससे कुछ खाया-पिया नहीं गया। जाने से पहले मीना ने अपने भाई से कहा था- 'मेरे प्यारे सोनू भैया, मैं जा रही हंू। तुम हमारे फूलों की देखभाल करना। हर फूल की मुस्कराहट में तुम मुझे हमेशा दिखोगे। 
सोचते-सोचते सोनू की आंखों में आंसू आ गये। आज मीना ने सपने में फिर वही बातें दोहराईं थी। उसने देखा कि उसके लगाये पौधे पानी के अभाव में मुरझा गये हैं। मीना की मौत के बाद किसी ने इनकी ओर ध्यान नहीं दिया था। अब न वहां तितलियों थीं और न सुंदर पक्षी। पोैधों में फूल भी नहीं खिले थे। ऐसा लगाता था, मानो मीना की मौत में ये नन्हें-नन्हें पौधे शरीर छोड़कर आंसू बहा रहे हैं। सोनू से यह सब देखा न गया। वह अपनी जगह से उठा और मन ही मन कहने लगा- 'नहीं, मैं अपनी प्यारी बहन मोनू को लौटा के ही रहूंगा। मैंने जो सपना देखा हेै उसे साकार करके रहूंगा।'
पौधों के आस-पास पड़ी सूखी पत्तियों को सोनू ने उठाकर फेंक दिया। फिर पौधों में पानी डाला। पानी पाकर पौधों में जीवन का संचार हुआ। अपने पिताजी से उसने ढेर सारे नये पौधे मंगा लिये और सबको अपने आंगन में लगा दिये।
नित्य देखभाल के कारण पौधे फिर अपनी पहली अवस्था में आ गये। फूल खिलने लगे। तितलियां आकर मंडराने लगीं। दो चार छोटे पक्षी भी आसपास चहकने लगे। सोनू के लगाये गये पौधे भी मंद-मंद मुस्कराने लगे। यह दृश्य देखकर सोनू को सपना याद आ गया। उसे लगा कि नन्हें-नन्हंे फूलों के भीतर से उसकी प्यारी बहन मीना झांक रही है और उससे कह रही है- 'आज मैं बहुत खुश हूं, मेरे भैया।' यह दृश्य देखकर सोनू की आंखों में खुशी के आंसू आ गये। उसका सपना साकार हो चुका था।


 


 


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