बुधवार, 21 अक्टूबर 2020

ग्रीन सिगनल





खामोश थी निगाहें उन की मैं समझ ना सका। 

ये प्यार है या फरेब निगाहों से तीर मारे थे हजारों दिल में इस तरह चुभ कर रह गए सभी के सभी निकाल ना सका कोई उन को। 

प्यार की घंटी बज चुकी थी जब हम चौराहे पर मिले थे ग्रीन सिगनल मिलते ही साथ साथ चल पड़े थे समाज ने रेड सिगनल दे कर दो दिलों की धड़कनों को रोक दिया था।

मुद्दतो के बाद ऐसे मिले जैसे हम अनजान थे। उसके दिल में राज किया था मैंने क्यों ना मैं दो कदम आगे बढ़कर उस को रोकूं क्यों ना मैं बहते हुए आंसुओं को पोंछू जोरजबरदस्ती का अंजाम देखा हम ने चुपके से समाज से दूर होकर एक आशियाना बनाया जहां सुकून मिल सके। 

लेकिन वह भी ज्यादा दिन ठहर ना सका आंधीतूफान में सब खाक हो गया उन सुर्खियों की ढेर में फिर भी भावनाएं ढूंढती रहती हैं उस ग्रीन सिगनल को। 

 

 



 



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