गुरुवार, 7 जनवरी 2021

सरकार यह क्यों नहीं मानती कि वह किसानों को अपनी बात समझाने में असफल हो रही है?

सातवें दौर की बातचीत में सरकार और किसान नेता सारे मामले हल कर लेंगे। ऐसा इसलिए लग रहा था कि छठे दौर की बातचीत में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के प्रति सद्भावना का प्रदर्शन किया था। सरकार ने माना था कि वह अपने वायु-प्रदूषण और बिजली-बिल के कानून में संशोधन कर लेगी ताकि किसानों की मुश्किलें कम हों।

किसान नेता इतने खुश हुए कि उन्होंने साथ लाया हुआ भोजन मंत्रियों को करवाया और मंत्रियों की चाय भी स्वीकारी। पिछली बैठकों में उन्होंने सरकारी भोजन और चाय लेने से मना कर दिया था। कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने घोषणा की कि किसानों की 50% मांगें तो सरकार ने मान ही ली हैं। लेकिन सातवें दौर की बैठक शुरू होती, उसके पहले ही किसान नेताओं ने स्पष्ट कर दिया कि असली मसला अपनी जगह खड़ा है। ये छोटी-मोटी मांगें थीं। असली मुद्दा तो यह है कि तीनों कृषि-कानून वापस हों और न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप दिया जाए। सरकार इसके लिए भी तैयार थी कि कोई संयुक्त कमेटी बना दी जाए, जो इन मुद्दों पर भलीभांति विचार करके राय पेश करे। लेकिन सातवें दौर की बातचीत भी बांझ साबित हुई।

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