मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020

लौटते कदम

जीवन में सुनहरे पल कब बीत जाते हैं। पता ही नहीं चलता हैं। वक़्त तो वही याद रहता है जो बोझिल हो जाता है। वही काटे नहीं कटता, उस के पंख जो नहीं होते हैं। दर्द पंखो को काट देता है। शादी के बाद पति का प्यार, बेटे की पढाई, घर की जिम्मेदारियो के बीच कब वैवाहिक जीवन के 35 साल गुजर गए, पता ही नहीं चला। आँख तो तब खुली जब अचानक पति की मृत्यु हो गई। मेरा जीवन, जो उन के आस पास घूमता था, अब अपनी ही छाया से बात करता है। पति कहते थे, 'सविता, तुम ने अपना पूरा वक़्त घर को दे दिया, तुम्हारा अपना कुछ भी नहीं है। कल यदि अकेली हो गई तो किया करोगी ? कैसे काटोगी वो खाली वक़्त ?' मैंने हंसते हुए कहा था, 'में तो सुहागिन ही मरूंगी। आपको रहना होगा मेरे बगैर। आप सोच लीजिए कि कैसे रहेंगे अकेले ?' किसे पता था कि उन की बात सच हो जाएगी। बेटा सौरभ, बहू रिया और पोते अवि के साथ जी ही लूंगी, यही सोचती थी। जिंदगी ऐसे रंग बदलेगी, इस का अंदाजा नहीं था। बहू के साथ घर का काम करती तो वह या तो अंगरेजी गाने सुनती या कान में लीड लगा कर बाते करती रहती। मेरे साथ, मुझ से बात करने का तो जैसे समय ही ख़त्म हो गया था। कभी में नहीं कहती, 'रिया, चल आज थोड़ा घूम आए। कुछ बाजार से सामान भी लेना है और छुट्टी का दिन भी है।' उस ने मेरे साथ बाहर न जाने की जैसे ठान ही ली थी। वह कहती, माँ एक ही दिन तो मिलता है, बहुत सारे काम हैं। फिर साम को बॉस के घर या कहीं और जाना हैं। बेटे के पास बैठती तो ऐसा लगता जैसे बात करने को कुछ बचा ही नहीं है। एक बार उस से कहा भी था, 'सौरभ, बहुत खाली पन लगता है। बेटा मेरा मन नहीं लगता है,' केहतेकहते आँखों में आंसू भी आ गए पर उन सब से अनजान वह बोला, "अभी पापा को गए 6 महीने ही तो हुए है न माँ, धीरेधीरे आदत पड़ जाएगी। तुम घर के आस पास के पार्क में क्यों नहीं जाती। थोड़ा बाहर जाओगी, तो नए दोस्त बनेंगे, तुम को अच्छा भी लगेगा। " 


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