शनिवार, 5 सितंबर 2020

समलैंगिकता: दुनिया की बदलती सोच

अमेरिका में समलैंगिक विवाह को सुप्रीम कोर्ट से अनुमति ही नहीं मिल गई। उसके पीछे अमेरिका की बदलती सोच है, अमेरिका कहने को तो सदा ही नए सितारों का स्वागत करता रहा है और वहां पुरातन  की कमी ना थी जो चर्च की महत्ता अमेरिका  के अधिकार गर्भपात पर पाबंदी समलैंगिकों को सामाजिक नासूर अपराधी मानना जैसी विचारधारा ऊपर विश्वास रखते थे।



अमेरिका की पूंजीवादी व्यवस्था का परिणाम रहा है और अमेरिकी सोचते रहे हैं कि उनके देश की प्रगति पूंजीवाद के कारण हुई है। पिछले 15 सालों में अमेरिका की सोच में फर्क आ रहा है सामाजिक व आर्थिक मुद्दों पर अमेरिका अब अति पूंजीवादी नीति का समर्थन करने में कतरा ने लगा है। अमेरिका में गे प्राइड उत्सव, समलैंगिक विवाह, लिव इन रिलेशनशिप, विदेशियों को जगह देने के बारे में  कट्टरता कम हो रही है। 


अमेरिका में एक सर्वे के अनुसार कट्टरपंथियों की गिनती 39% से घटकर 31 प्रतिशत रह गई है और उदार बनती वामपंथियों की संख्या पूरी जनता के 21% से बढ़कर 32% हो गई है, यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि अब अमेरिका की नीतियों का बदलाव  दिखने लगा है अमेरिका ने अपनी आर्थिक प्रगति की ने को एक तरह से इंग्लैंड की कट्टरता के विरुद्ध उदार चेहरे के तौर पर पेश किया था। अमेरिका ने व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं को संविधान का होते हुए कट्टरपंथी भी बनाने लगा था जब दुनिया के दूसरे देशों में स्वतंत्रताए मिलने लगी तो अमेरिका का संवैधानिक ढांचा वोट के जरिए शासकों को चुना जाना न्यायपालिका प्रेस की स्वतंत्रता के ज्यादा  माने नहीं रहे और कई मामलों में पिछली सदी के अंतिम दशकों में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन रोनाल्ड रिगन जॉर्ज बुश आदि की छत्रछाया में कट्टरपंथी फले फूले वर्ष 2008 के स्टॉक मार्केट गुब्बारे के फूटने के बाद अमेरिका को एहसास हुआ कि पूंजीवाद बेलगाम हो रहा है और  सक्रिय होना जरूरी है वरना 1% लोग 99% पर कब्जा ही नहीं करेंगे उन्हें लूट भी लेंगे भारत में कट्टरपंथियों को हमेशा जगह मिलती रही है।



इंदिरा गांधी गरीबी हटाओ और समाजवाद के नारों के बावजूद कट्टरपंथी समाज को यथावत रखने के पक्ष में थी बाद में मंडल आयोग के आने के कारण राजनीति में आए नेताओं ने एक कट्टरपंथी सोच को दूसरी कट्टरपंथी सोच में बदलाव था मूलभूत सोच अभी वही ही है दहेज कन्या भ्रूण हत्या किसानों की जमीन हथियाना विचारों पर धार्मिक संस्थाओं के अंकुश का समर्थन ऑनर किलिंग बढ़ता जमीन संघर्ष उसी कट्टरपंथी सोच का नतीजा है। पिछड़े दबे कुचले गरीबों के मसीहा कम्युनिस्ट ममता बनर्जी, लालू प्रसाद यादव, मायावती, मुलायम सिंह यादव और राहुल गाँधी एक कट्टर सोच को दूसरी कट्टर सोच से हटाने मात्र का नाटक कर रहे है और इसलिए आज अति कट्टरपंथी हावी हो रहे हैं। यह असल में विस्फोटक स्थिति है। डकैती खुले विचारों की जमीन पर हो सकती है। पथरीली जमीन पर पेड़ नहीं उगते अमेरिका एक राह दिखा रहा है दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र क्या सर्वशक्तिमान लोकतंत्र से कुछ दिखेगा। 


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