शनिवार, 5 सितंबर 2020

धर्म प्रचारकों का शब्द जाल- प्रचारकों का विशेष गुण

लच्छेदार भाषा का प्रयोग करना किसी भी धर्म के प्रचारकों का विशेष गुण हैं और उनके सारे प्रवचनों का अंत दान दक्षिणा पर होता है। चाहे वह आशाराम बापू हो, कथा वाचक सुरेंद्र विहारी गोस्वामी या कोई और।  सबसे पहले ये लोग खास तोड़ पर हिन्दू धर्म की औरतों को शिकार बनाते है वो दूसरी बात है कि कई मुर्ख पुरुष भी उनके भरम जाल में फंस जाते है।



भीड़ में ज्ञान दिया था कि व्यक्तित्व मैं निखार तब आता है जब भक्ति की लहरें आने लगे, वरना व्यक्तित्व का सागर थमा रहता है। यह कैसा तर्क है? हमारा व्यक्तित्व हमारी बोलचाल हमारी बुद्धि, हमारे व्यवहार, हमारे गुणों पर निर्भर है। भक्ति और वह भी राधा व उसकी सहेलियों जैसी जो कृष्ण की बांसुरी की तान सुनकर सब काम छोड़ कर उसे निहारने के लिए दौड़ पड़े किस काम की। भक्ति का प्रपंच तो तथाकथित भगवान के बिचौलियों को खुश करने के लिए रचा जाता था। इसलिए कथा वाचक भक्ति को परमात्मा से और गुरु को परमात्मा का रूप सिद्ध करने में लगे रहते हैं। शब्द जाल का कमाल देखिए कि कथा वाचक चेतन और जड़ता का अंतर ही समाप्त कर देते हैं। चेतन का अर्थ है जो चैता हुआ है और जब वह चेता हुआ है तो जड़ से कैसे हुआ। 


जड़ कोई कैसे हो सकता है जड़ होगा तो वाचक की कथा सुनने के लिए कैसे आएगा। कथा में जो लोग मौजूद होते हैं उन में पैसे वाले भी होते हैं, बड़े विश्वास से कह दिया जाता है कि भक्ति से आत्मा परमात्मा से मिल जाती है। अगर उन कथावाचकओं के अनुसार परमात्मा कण कण में मौजूद है तो किस की आत्मा में परमात्मा नहीं है। मैं कथा सुनकर परमात्मा के निकट आए, व कथा सुनकर परमात्मा के निकट आए यह शब्द जाल भ्रम फैलाने के लिए है। इसका उद्देश्य है कि परमात्मा के एजेंट गुरु को परमात्मा मानो उसे दान दो, उसकी तन- मन- धन से सेवा करो। 


मजेदार बात यह है कि मंदिरों जहां इस प्रकार के ज्ञान का प्रवाह होता है वहां परमात्मा विराजे रहते हैं। मध्यप्रदेश के मुलताई के जगदीश मंदिर का एक विवाद 2007 से चल रहा है वहां मूर्तियों के आगे पेश या नहीं चल नहीं होती। अदालत में होती हैं विवाद मंदिर की जमीन को लेकर है पर ज्ञान से सराबोर गुरु और उनके समक्ष परमात्मा फैसला नहीं कर पा रहे, फैसला आम आदमी से जज बने न्यायधीश कर रहे हैं। क्या यही शक्ति है भक्ति है?


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