शनिवार, 16 मई 2020

मां किसी डे की मोहताज नहीं__

आज मदर्स डे  पर व्हाट्स  अप और फेस बुक पर  खूब जोर शोर से मा के प्रति प्रेम का प्रचार प्रसार किया जा रहा है।काश मा के पास कुछ पल बैठ जाते  तो जीवन सफल हो जाता ।आश्रमों में ताले लग जाते । लेकिन  पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर मदर्स डे की नकल करने मै लग गए।जबकि सदियों से भारत मै मा का स्थान  सर्वोपरि रहा है। मा का ऋण कोई नहीं चुका पाया ।टोडरमल भी मा का कर्जा ना चुका सके। जन्म देने वाली मा पहले दिन से शिशु के मल मूत्र पर सारी रात सोती है लेकिन नवजात शिशु को सूखे बिस्तर पर या अपने सीने पर सुलाती है। क्या कोई वयस्क  बेटा/बेटी स्वयं गीले और मा को सूखे बिस्तर पर एक रात भी सो सकता है शायद नहीं।  आज कलयुग ही सही पर भारत में आज भी  मा बाप घरों मै अंत समय तक सुशोभित होते है। जबकिपश्चिम के लोग अपने माता पिता को बुढ़ापे में ओल्ड होम्स मे भेज देते हैं


साल मे एक दिन मे कुछ घंटे जाकर उनके साथ गुजारते है फल, वस्त्र और बुके देकर लौट  आते है और साल भर के लिए मदर्स डे को भी अलविदा कर देते है। हमारी श्रेष्ठतम संस्कृति को छोड़कर क्या हम इस व्यवस्था को बढाना चाहते है?


माता की उत्पत्ति मातृ से है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- पूज्यनीय। महर्षि यास्क के अनुसार माता  जन्म देने  वाली अथवा जननी है। केवल जन्म देने अथवा पालन-पोषण करने के कारण ही नहीं बल्कि स्नेह, ममता, त्याग, करुणा, सहनशीलता जैसे गुणों के कारण मां वंदनीय है। इसी कारण शास्त्रों में माता को पिता एवं गुरु से कई गुना श्रेष्ठ माना गया है। मां का स्वरूप अत्यंत विराट है। खुद को भूखा रखकर भी बच्चों तथा परिवार की क्षुधा-पूर्ति करने वाली ईश्वरीय कृति है- मां। संतान चाहे कुपात्र निकल जाए, किंतु जन्म देने वाली मां कभी कुमाता नहीं होती। कष्ट देने वाले अथवा दोषसिद्ध पुत्र के पक्ष में वह स्वयं अपना विवेक खोकर दृढ़तापूर्वक खड़ी रहती है। मां वह अक्षय स्थान है जिसमें अपनी चिंताएं एवं संकट डालकर हम आजीवन सुख, शांति व आनंद पा सकते हैं। ब्रंावतैत्तिरीयोपनिषद् में मातृदेवो भव के अंतर्गत माता को देवतुल्य मानते हुए उसकी सेवा का कल्याणकारी उपदेश है। महर्षि सुमंतु के अनुसार मां की सेवा से आयु, बल, यश, कीर्ति, धन, की प्राप्ति होती है। मां ही भाईं बहनों और परिवार को जोड़ कर रखती है मा  केवल मा होती है किसी डे की मोहताज नहीं। वह नहीं तो तीज त्योहार पर,सुख दुख मै बुलाने वाला भी कोई नहीं ।घर की चौखट पर राह देखने वाला भी कोई नहीं। सिर्फ मा ही आंखो मै इंतजार का सपना लिए और दोनों हाथों मै  आशीर्वाद देने को बेताब रहती है । मां केवल मा होती है कोई लालच या स्वार्थ नहीं।


 


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