कोरोना जीवन की सत्यता को समझा रही है । सनातनी जीवन शैली को सिखा रही है । कैसे? जीवन को जीने की दो आधार विचार है। एक जो सर्वे भवन्तु सुखिन: पर आधारित है ,दूसरा हम या मै यानि हम जिंदा रहे खाए पिए और दूसरा कोई नहीं । सारे बाकि लोग खत्म हो जाए।
सनातन प्रोसेसिंग प्रणाली पूजी वादी प्रोसेसिंग प्रणाली से हर स्तर पर अच्छी है। सनातन प्रोसेसिंग प्रणाली उपभोक्ता और पर्यावरण दोनों के लिए लाभकारी है ।
उदाहरण के लिए पंजाब मै संगरूर गांव में 500 व्यक्ति कुल्फी बनाने के धंधे में लगे है। यहां के यह लोग गांव मै ही दूध खरीद कर रात को जमा देते है और सुबह शहर जाकर बैच देते है सबको ताज़ी कुल्फी खाने को मिलती है यह प्रणाली सनातन प्रोसेसिंग का आधार उदाहरण है।
दूसरी तरफ पू जीवादी प्रोसेसिंग प्रणाली मै संगरूर गांव का दूध 72 किलोमीटर दूर लुधियाना मै किसी आइसक्रीम प्लांट पर ट्रक मै भैजा जाएगा। कुल्फी बनेगी और फिर से ट्रक मै भरकर संगरूर गांव और शहर मै बिकने के लिए आएगी। कुल्फी दोनो ही है ।पर यह पुजीवादी प्रणाली का उदाहरण है ।
सनातन प्रणाली मै शुद्ध और ताज़ी कुल्फी खाने को मिली। और पूजीवादी मै प्रदूषण युक्त और खर्चा भी ज्यादा। पूजी वादी प्रणाली ट्रांसपोर्ट के बिना संभव नहीं। पहले दूध भी ट्रांसपोर्ट द्वारा जमा किया जाएगा।फिर लुधियाना भी आइस प्लांट पर पहुंचाया जाएगा । इससे प्रदूषण अलग फैलता है। रात दिन लाखो ट्रक सामान ढोते रहते है । इसीलिए ट्रक लेने के लिए लोन भी फटाफट मिल जाता है ।ताकि पूजीवादी प्रोसेसिंग प्रणाली को सस्ता ट्रांसपोर्ट मुहैया कराया जा सके।
इसी तरह सनातन प्रणाली मै पैकिंग,या प्लास्टिक की जरूरत नहीं पड़ती। जबकि पूजी वादी प्रणाली प्लास्टिक के बिना नहीं चल पाती। कोई भी सामान वितरित करने के लिए उन्हें प्लास्टिक कवर चाहिए। कुल्फी भी मिलेगी तो प्लास्टिक कवर मै। सनातन वाले सीधे निकाल कर खाने को से देगे।
शायद यही कारण है समुन्द्र भी यदि प्लास्टिक से भर जाए पर प्रतिबंध सफल नहीं होता ।हफ्ता दो हफ्ता प्लास्टिक बंद फिर शुरू हो जाता है।
सनातनी प्रणाली की कुल्फी मै कोई केमिकल का भी प्रयोग नहीं होता जबकि पूजी वादी प्रणाली मै एक्सपायरी डेट भी होगी। यह तो अकाट्य सत्य है दूध को फटने से बचाने के लिए केमिकल डालना बहुत जरूरी है। वर्ना दूध फट जाएगा।
यह रसायन और केमिकल जल को दूषित करते है। दूषित जल नदी नालो मै प्रवाहित कर दिया जाता है।कहीं कहीं धरती के अंदर डाल दिया जाता है। जिससे भीषण रोग पैदा होते है।
शुद्ध जल स्वयं मै अमृत है उसे भी मशीनें लगाकर पीने लायक बनाया जाता हैं। जल की स्वयं शक्ति भी खत्म कर दी जाती है। मशीनों को लगाकर हम विकास का नाम देते है। पर यह विकास हमारा परोक्ष रूप से अविकास बन जाता है।
इस मशीनीकरण के जल ने इंसान को इतना खोखला बना दिया है कि आरोह का पानी ना मिला वह बीमार हो जाता है। क्यू कि जो जल मै गुण होते है उससे हमारी क्षमता जिसे इम्यून कहते है वह भी बढ़ती है ।पर आज इस क्षमता मै भी मशीनीकरण द्वारा दीमक लगा दी है। दीमक कहां तक फैल चुकी है कोई नहीं जानता ।
पर यह भी सत्य है कोरोंना ने उस सनातनी प्रणाली को फिर से जगा दिया। सब महिलाएं खुद सब काम कर रही है। चंद कपड़े जीने के लिए बहुत है। पीज़ा बर्गर की जगह शुद्ध खाना सब खा रहे है। जिंदगी जीनी है तो सनातन जीवन प्रणाली को अपनाए ।जीवन सुखमय,आनंदित,और शांतिपूर्ण होगा।
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