पूरे विश्व मै कोरना ने अपने पैरो तले असख्य लोगो को मौत की नीद सुला दिया है। मेडिकल साइंस के देशों ने भी घुटने टेक दिए। बेबस आंख में आंसू लिए भारत की और देख रहे है ।जिंदगी भर ज्ञान से अव्वल आने वाले आज भारत की नकल करके जिंदगी का दिन पास कर रहे है। हमारे धार्मिक ग्रंथो मै अनादि काल से जीवन के हर पहलू,बीमारी हो या महामारी सबका इलाज और बचाव लिखा हुआ है।आज फिर से वक़्त उन महाग्रंथों को पढ़ने की गुहार लगा रहा है ।।हिंदू धर्म में हजारों सालों से संक्रमण से बचने के लिए कुछ सूत्र हमारे महाग्रंथों मै हमारे महान संतों ने लिखे है जो अब पूरी दुनिया अपना रही है-जैसे
महाभारत में लिखा है__
तथा न अन्यधृतं धार्यम्
(महाभारत अनु.104/86)
दुसरों के पहने कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
आज के इस कोरोना सम्राज्य मै यही तो कहा जा रहा है
इसी प्रकार
वाधूल स्मृति में भी बरसो पहले लिखा है हमारे आचार्यों ने
स्नानाचारविहीनस्य सर्वा:स्यु: निष्फला: क्रिया:(वाधूलस्मृति 69)
स्नान और शुद्ध आचार के बिना सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, अतः: सभी कार्य स्नान करके शुद्ध होकर करने चाहिए।
आज बाहर निकलो या किसी के साथ स्पर्श हो जाए तो नहा लेे।
लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च। लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत्।
(धर्मसिंधु 3 पू.आह्निक)
नमक, घी, तैल, कोई भी व्यंजन, चाटने योग्य एवं पेय पदार्थ यदि हाथ से परोसे गए हों तो न खायें, चम्मच आदि से परोसने पर ही ग्राह्य हैं।
आज के संदर्भ में यह भी शत प्रतिशत लागू होता है। नाही किसी के हाथ से खाने का कुछ ले। नाही किसी को दे।
न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं वसनं बिभृयात्।
(विष्णुस्मृति 64)
पहने हुए वस्त्र को बिना धोए पुनः न पहनें। पहना हुआ वस्त्र धोकर ही पुनः पहनें।
विष्णु स्मृति मै बहुत पहले लिखा जा चुका है सामान्य जीवन जीने के लिए ।जो आज महामारी मै अत्यंत आवश्यक है।
चिताधूमसेवने सर्वे वर्णा: स्नानम् आचरेयु:। वमने श्मश्रुकर्मणि कृते च
(विष्णुस्मृति 22)
श्मशान में जाने पर, वमन होने/करने पर, हजामत बनवाने पर स्नान करके शुद्ध होना चाहिए।
विष्णु स्मृति मै सामान्य जीवन के यह रोजमर्रा के नियम था। आज कोरोना से बचने के लिए कहा जा रहा है। यानि जहा चार लोग जमा हो स्पर्श हो वापस आकर नहा ले । ताकि स्पर्श का कोई भी कीटाणु समाप्त हो जाए।
हस्तपादे मुखे चैव पञ्चार्द्रो भोजनं चरेत्।(पद्मपुराण सृष्टि 51/88)
नाप्रक्षालित पाणिपादौ भुञ्जीत।(सु.चि.24/98)
हाथ, पैर और मुंह धोकर भोजन करना चाहिए।
पद्म पुराण मै सात्विकता और स्वछता की दृष्टि से लिखा कहा गया। लेकिन आज जीवन बचाने के लिए यह करना बहुत आवश्यक है।
अपमृज्यान्न च स्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभि:।
(मार्कण्डेय पुराण 34/52)
स्नान करने के बाद अपने हाथों से या स्नान के समय पहने भीगे कपड़ों से शरीर को नहीं पोंछना चाहिए, अर्थात् किसी सूखे कपड़े (तौलिए) से ही पोंछना चाहिए।
न वार्यञ्जलिना पिबेत्।( मनुस्मृति 4/63)
नाञ्जलिपुटेनाप: पिबेत्।(सु.चि.24/98)
अंजलि से जल नहीं पीना चाहिए, किसी पात्र(गिलास) से जल पीयें।
न धारयेत् परस्यैवं स्नानवस्त्रं कदाचन।
(पद्मपुराण सृष्टि 51/86)
दुसरों के स्नान के वस्त्र (तौलिए इत्यादि) प्रयोग में न लें।
इन पुराने महाग्रंथों के लिखे श्लोक आज जीवन को बचाने की मूल दवाई सामान है ।
भारत की आबादी करोड़ों की है। हजारों लोग एक छोटी सी झोपडी मै 6/6 लोग भी रहते है।यदि बंद का ऐलान प्रधानमंत्री ना करते तो आज यहां भी लाशों के ढेर लग जाते । पर आज पूरे भारत मै "अंदर रहो जीवन बचाओ" का नारा गूंज रहा है। यदि लोग इस लॉकडॉउन मै अपने धार्मिक ग्रंथो को भी पढ़े तो आगे आने वाली जिंदगी किसी भी कोरोना के आगे बेबस नहीं होगी।
आधुनिक अस्पताल और मेडिकल साइंस धराशाई हो चुके हैं और समस्त विश्व हजारों साल पहले धार्मिक ग्रंथो मै लिखे बचाव के उपाय अपना रहा है।
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