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जय सत्य सनातन
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युगाब्द-५१२४*
युगाब्द-५१२४**
विक्रम संवत-२०७९*
विक्रम संवत-२०७९**
तिथि - चतुर्थी रात्रि 09:01 तक तत्पश्चात पंचमी*
तिथि - चतुर्थी रात्रि 09:01 तक तत्पश्चात पंचमी**
दिनांक - 15 अगस्त 2022*
दिनांक - 15 अगस्त 2022**
दिन - सोमवार*
दिन - सोमवार**
शक संवत् - 1944*
शक संवत् - 1944**
अयन - दक्षिणायन*
अयन - दक्षिणायन**
ऋतु - वर्षा*
ऋतु - वर्षा**
मास - भाद्रपद*
मास - भाद्रपद**
पक्ष - कृष्ण*
पक्ष - कृष्ण**
नक्षत्र - उत्तर भाद्रपद रात्रि 09:07 तक तत्पश्चात रेवती*
नक्षत्र - उत्तर भाद्रपद रात्रि 09:07 तक तत्पश्चात रेवती**
योग - धृति रात्रि 11:24 तक तत्पश्चात शूल*
योग - धृति रात्रि 11:24 तक तत्पश्चात शूल**
राहु काल - सुबह 07:53 से 09:30 तक*
राहु काल - सुबह 07:53 से 09:30 तक**
सूर्योदय - 06:16*
सूर्योदय - 06:16**
सूर्यास्त - 07:12*
सूर्यास्त - 07:12**
दिशा शूल - पूर्व दिशा में*
दिशा शूल - पूर्व दिशा में**
ब्राह्ममुहूर्त - प्रातः 04:48 से 05:32 तक*
ब्राह्ममुहूर्त - प्रातः 04:48 से 05:32 तक**
निशिता मुहूर्त - रात्रि 12:22 से 01:06 तक*
निशिता मुहूर्त - रात्रि 12:22 से 01:06 तक**
व्रत पर्व विवरण - स्वतंत्रता दिवस*
व्रत पर्व विवरण - स्वतंत्रता दिवस**
विशेष - चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है । (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*
विशेष - चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है । (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)* *
'बुफे सिस्टम’ नहीं, भारतीय भोजन पद्धति है लाभप्रद*
'बुफे सिस्टम’ नहीं, भारतीय भोजन पद्धति है लाभप्रद*
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आजकल सभी जगह शादी-पार्टियों में खड़े होकर भोजन करने का रिवाज चल पडा है लेकिन हमारे शास्त्र कहते हैं कि हमें नीचे बैठकर ही भोजन करना चाहिए । खड़े होकर भोजन करने से हानियाँ तथा पंगत में बैठकर भोजन करने से जो लाभ होते हैं वे निम्नानुसार हैं : *
आजकल सभी जगह शादी-पार्टियों में खड़े होकर भोजन करने का रिवाज चल पडा है लेकिन हमारे शास्त्र कहते हैं कि हमें नीचे बैठकर ही भोजन करना चाहिए । खड़े होकर भोजन करने से हानियाँ तथा पंगत में बैठकर भोजन करने से जो लाभ होते हैं वे निम्नानुसार हैं : *
*खड़े होकर भोजन करने से हानियाँ* 
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(१) यह आदत असुरों की है । इसलिए इसे ‘राक्षसी भोजन पद्धति’ कहा जाता है ।*
(१) यह आदत असुरों की है । इसलिए इसे ‘राक्षसी भोजन पद्धति’ कहा जाता है ।*
*(२) इसमें पेट, पैर व आँतों पर तनाव पड़ता है, जिससे गैस, कब्ज, मंदाग्नि, अपचन जैसे अनेक उदर-विकार व घुटनों का दर्द, कमरदर्द आदि उत्पन्न होते हैं । कब्ज अधिकतर बीमारियों का मूल है ।*
*(३) इससे जठराग्नि मंद हो जाती है, जिससे अन्न का सम्यक् पाचन न होकर अजीर्णजन्य कई रोग उत्पन्न होते हैं ।*
*(४) इससे हृदय पर अतिरिक्त भार पड़ता है, जिससे हृदयरोगों की सम्भावनाएँ बढ़ती हैं ।*
*(५) पैरों में जूते-चप्पल होने से पैर गरम रहते हैं । इससे शरीर की पूरी गर्मी जठराग्नि को प्रदीप्त करने में नहीं लग पाती ।*
*(६) बार-बार कतार में लगने से बचने के लिए थाली में अधिक भोजन भर लिया जाता है, फिर या तो उसे जबरदस्ती ठूँस-ठूँसकर खाया जाता है जो अनेक रोगों का कारण बन जाता है अथवा अन्न का अपमान करते हुए फेंक दिया जाता है ।*
*(७) जिस पात्र में भोजन रखा जाता है, वह सदैव पवित्र होना चाहिए लेकिन इस परम्परा में जूठे हाथों के लगने से अन्न के पात्र अपवित्र हो जाते हैं । इससे खिलानेवाले के पुण्य नाश होते हैं और खानेवालों का मन भी खिन्न-उद्विग्न रहता है ।*
*(८) हो-हल्ले के वातावरण में खड़े होकर भोजन करने से बाद में थकान और उबान महसूस होती है । मन में भी वैसे ही शोर-शराबे के संस्कार भर जाते हैं ।*
*बैठकर (या पंगत में) भोजन करने से लाभ* 
*(१) इसे ‘दैवी भोजन पद्धति’ कहा जाता है ।*
*(२) इसमें पैर, पेट व आँतों की उचित स्थिति होने से उन पर तनाव नहीं पड़ता ।*
*(३) इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है, अन्न का पाचन सुलभता से होता है ।*
*(४) हृदय पर भार नहीं पड़ता ।*
*(५) आयुर्वेद के अनुसार भोजन करते समय पैर ठंडे रहने चाहिए । इससे जठराग्नि प्रदीप्त होने में मदद मिलती है । इसीलिए हमारे देश में भोजन करने से पहले हाथ-पैर धोने की परम्परा है ।*
*(६) पंगत में एक परोसनेवाला होता है, जिससे व्यक्ति अपनी जरूरत के अनुसार भोजन लेता है । उचित मात्रा में भोजन लेने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है व भोजन का भी अपमान नहीं होता ।*
*(७) भोजन परोसनेवाले अलग होते हैं, जिससे भोजनपात्रों को जूठे हाथ नहीं लगते । भोजन तो पवित्र रहता ही है, साथ ही खाने-खिलानेवाले दोनों का मन आनंदित रहता है ।*
*(८) शांतिपूर्वक पंगत में बैठकर भोजन करने से मन में शांति बनी रहती है, थकान-उबान भी महसूस नहीं होती ।*
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