🚩जय सत्य सनातन🚩
🌥️ 🚩युगाब्द-५१२२
🌥️ 🚩सप्तर्षि संवत-५०९७⛅ *🚩विक्रम संवत-२०७७
⛅ 🚩तिथि - चतुर्थी सुबह 10:59 तक तत्पश्चात पंचमी
⛅ दिनांक 01 अप्रैल 2021
⛅ दिन - गुरुवार
⛅ विक्रम संवत - 2077
⛅ शक संवत - 1942
⛅ अयन - उत्तरायण
⛅ ऋतु - वसंत
⛅ मास - चैत्र
⛅ पक्ष - कृष्ण
⛅ नक्षत्र - विशाखा सुबह 07:22 तक तत्पश्चात अनुराधा
⛅ योग - सिद्धि 02 अप्रैल प्रातः 02:47 तक
⛅ राहुकाल - दोपहर 02:15 से शाम 03:58 तक
⛅ सूर्योदय - 06:33
⛅ सूर्यास्त - 18:52
⛅ दिशाशूल - दक्षिण दिशा में
⛅ व्रत पर्व विवरण -
💥 विशेष - चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)
🌷 इन तिथियों का लाभ अवश्य लें 🌷
➡ 07 अप्रैल : पापमोचनी एकादशी ( व्रत से पापराशि का विनाश)
➡ 12 अप्रैल : सोमवती अमावस्या (सूर्योदय से सुबह 08:01 तक) (तुलसी की 108 परिक्रमा करने से दरिद्रता – नाश ), चैत्री अमावस्या (ध्यान, जप बहुत लाभदायी)
➡ 13 अप्रैल : गुडी पाडवा ( पूरा दिन शुभ मुहूर्त), चैत्री नवरात्र प्रारम्भ, चेटीचंड
➡ 14 अप्रैल : संक्रांति (पुण्यकाल : सूर्योदय से दोपहर 12:40 तक)
🕉️गायत्री महाविज्ञान🕉️
गायत्री उपेक्षा की भर्त्सना
बरसोड़ा में एक ऋषिराज ने सात वर्ष तक निराहार रहकर गायत्री पुरश्चरण किए थे। उनकी वाणी सिद्ध थी। जो कह देते थे, वही होता था। मासिक कल्याण पत्रिका के सन्त अंक में हरेराम नामक एक ब्रह्मचारी का जिक्र छपा है। यह ब्रह्मचारी गंगाजी के भीतर उठी हुई एक टेकरी पर रहते थे और गायत्री जी की आराधना करते थे।
उनका ब्रह्मतेज अवर्णनीय था। सारा शरीर तेज से दमकता था। उन्होंने अपनी सिद्धियों से अनेकों के दु:ख दूर किए थे। देव प्रयाग के विष्णुदत्त जी वानप्रस्थी ने चान्द्रायण व्रतों के साथ सवा लक्ष जप के सात अनुष्ठान किये थे। इससे उनका आत्मबल बहुत बढ़ गया था। उन्हें कितनी ही सिद्धियाँ मिल गयी थीं। लोगों को जब पता चला, तो अपने कार्य सिद्ध कराने के लिए उनके पास दूर- दूर से भी आने लगे। वानप्रस्थी जी इस खेल में उलझ गये। रोज- रोज बहुत खर्च करने से उनका शक्ति भण्डार चुक गया। पीछे उन्हें बड़ा पश्चात्ताप हुआ और फिर मृत्युकाल तक एकान्त साधना करते रहे। रुद्र प्रयाग के स्वामी निर्मलानन्द संन्यासी को गायत्री साधना से भगवती के दिव्य दर्शन और ईश्वर साक्षात्कार का लाभ प्राप्त हुआ था। इससे उन्हें असीम तृप्ति हुई। बिठूर के पास खाँडेराव नामक एक वयोवृद्ध तपस्वी एक विशाल खिरनी के पेड़ के नीचे गायत्री साधना करते थे। एक बार उन्होंने विराट् गायत्री यज्ञ का ब्रह्मभोज किया। दिन भर हजारों आदमियों की पंगतें होती रहीं। रात नौ बजे भोजन समाप्त हो गया। भोजन अभी कई हजार आदमियों का होना शेष था। खाँडेरावजी को सूचना दी गयी तो उन्होंने आज्ञा दी, गङ्गा जी में से चार कनस्तर पानी भरकर लाओ और उसमें पूडिय़ाँ सिकने दो। ऐसा ही किया गया। पूडिय़ाँ घी के समान स्वादिष्ट थीं। दूसरे दिन चार कनस्तर घी मँगवाकर गंगाजी में डलवा दिया। काशी में जिस समय बाबू शिवप्रसाद जी गुप्त द्वारा ‘भारत माता मन्दिर’ का शिलारोपण समारोह किया गया था, उस समय २०० दिन तक का एक बड़ा महायज्ञ किया गया, जिसमें विद्वानों द्वारा २० लाख गायत्री जप किया गया। यज्ञ की पूर्णाहुति के दिन पास में लगे पेड़ों के सूखे पत्ते फिर से हरे हो गये थे और एक पेड़ में तो असमय ही फल भी आ गए थे।
इस अवसर पर पं. मदनमोहन मालवीय, राजा मोतीचन्द्र, हाई कोर्ट के जज श्री कन्हैयालाल और अन्य अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे, जिन्होंने यह घटना अपनी आँखों से देखी और गायत्री के प्रभाव को स्वयं अनुभव किया। गढ़वाल के महात्मा गोविन्दानन्द अत्यन्त विषधर साँपों के काटे हुए रोगियों की प्राण रक्षा करने के लिए प्रसिद्ध थे। उनका कहना था कि मैं गायत्री जप से ही सब रोगियों को ठीक करता हूँ। इसी प्रकार समस्तीपुर के एक सम्पन्न व्यक्ति शोभान साहू भी गायत्री मन्त्र से अत्यन्त जहरीले बिच्छुओं और पागल कुत्ते के काटे तक को चंगा कर देते थे। अनेक सात्त्विक साधक केवल गायत्री मन्त्र से अभिमन्त्रित जल द्वारा बड़े- बड़े रोगों को दूर कर देते हैं। स्वर्गीय पण्डित मोतीलालजी नेहरू का जीवन उस समय के वातावरण के कारण यद्यपि एक भिन्न कर्तव्य क्षेत्र में व्यतीत हुआ था, पर जीवन के अन्तिम समय में उनको गायत्री का ध्यान आया और उसे जपते हुए ही उन्होंने जीवन लीला समाप्त की। इससे विदित होता है कि गायत्री का संस्कार शीघ्र ही समाप्त नहीं होता, वरन् आगामी पीढिय़ों तक भी प्रभाव डालता रहता है।
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