मिट्टी ने कुम्हार से कहा - "मुझे ऐसा सौभाग्यशाली दीपक बना दीजिए, जो भगवान के मंदिर को भी प्रकाश से भर सकें।" कुमार ने कहा - "यह कुछ भी कठिन नहीं। तुम कुचले जाने, चाक पर घूमने और आँवाँ में पकने भर को तैयार हो जाओ। मेरे हाथ तुम्हारी इच्छापूर्ति में पूरी-पूरी सहायता करेंगे।"
वास्तव में हर व्यक्ति के लिए ऐसे अवसर आते हैं कि कौन कितना, किस स्थिति में स्वयं को लचीला बनाता और परिस्थितियों के अनुरूप बदलता है, इसी पर उसके जीवन की सार्थकता निर्भर है।
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