बुधवार, 23 सितंबर 2020

स्वाभिमानी मुस्कान हूं

मैं त्याग की देवी नहीं। मैं स्वाभिमानी मुस्कान हूं। मैं संस्कृति का पिटारा खोलकर आदर्श यह बतलाना न सीता गांधारी के उदाहरणों से अब दुर्बल हमें बनाना न क्यों बांधे आंखों पर पट्टी खुली आंख सही पथ न दिखा दूं।  क्यों दूं अग्नि परीक्षा न परीक्षकों को ही अब दें पाऊं। जीवनदान धर्म की आड़ में किया नारी को निर्बल इतनी क्यों हैरान हूं। मैं दे सको तो मान दो की साहस भरी इंसान हूं। मैं जीने को मिला अपना जीवन खुशियों के संग में वीर ही उर्मिला बनू किस लिए रहूं। अन ब्याही प्रेयसी राधा सी क्यों   जहर पी  मीरा सी बन प्रेम की दीवानी खुद को अबला नारी बतलाऊं। क्यों बुद्धि विवेक से रखती संयम शक्ति की अद्भुत पहचान हूं मैं दे सको तो मान दो की साहस भरी इंसान हूं मैं मुझ में वैसा ही साहस जो  बुंदेलों की लक्ष्मीबाई में कूट भरा चमक है। मेरे हाथों में रजिया की तलवारों से बुद्धि मैं गार्गी सा ज्ञान खरा कमजोर समझने की भूल ना करना ना करने की अब हिम्मत भी करना दे सको तो बस मान ही दो साहस भरी इंसान हूं मैं।  


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