शनिवार, 5 सितंबर 2020

कहानी - टाइमपास

रमेश जैसे पति को पाकर खुद को धन्य मानने वाली रीना को आज क्यों अपनी  दुनिया वीरान और सोनी लग रही थी। क्यों वह रमेश की परछाई से भी इस समय दूर जाना चाह रही थी। पार्वती तुम आज और अभी यह कमरा खाली कर दो और यहां से चली जाओ भाभी मैं कहां जाऊंगी मुझे इससे कोई मतलब नहीं तुम कहीं भी जाओ जियो मरो मेरी बला से मैं तुम्हारी शक्ल नहीं देखना चाहती रीना का दिल एक लाने के लिए पार्वती आखरी अस्त्र का प्रयोग करते हुए उनके पैर पकड़कर फूट-फूट कर रोने लगी।


अपना से उनके पैरों पर रख कर बोलना भी माफ कर दो मुझसे गलती हो गई तुम अपना सामान खुद बाहर निकालो की टीम निकालो घी की मैं वॉचमैन से कह कर बाहर निकलवा हूं रीना खिड़की से चोर नेताओं से रमेश के घबराए हुए चेहरे को देख रही थी। ड्राइंग रूम में बेचैनी से चहल कदमी करते हुए चक्कर काट रहे थे का साथ ही बार-बार चेहरे से पसीना पूछ रहे थे मीना की कड़कती आवाज और उसके क्रोध से पार्वती डर गई और निराश होकर उसने अपना सामान समेटना शुरू कर दिया उसकी आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे। आज रमेश में रीना के विश्वास को तोड़ा था रीना के मन में विचारों की उमड़ घुमड़ मची हुई थी 30 वर्ष  से उसका वैवाहिक जीवन खुशी खुशी बीत रहा था रमेश जैसा पति पाकर वह सदा से अपने को धन्य मानती थी पे मस्त मौला और हंस और स्वभाव के थे बातचीत में कहकहे लगाना उनकी आदत थी रोते हुए को हंसा ना उनके लिए छुट्टियों का काम था चुटकियों का काम था।


रमेश बहुत आशिक मिजाज ठीक है महिलाएं उन्हें बहुत पसंद करती थी 62 वर्षीय रीना तो प्यारी प्यारी बेटियों की सारी जिम्मेदारी पूरी कर चुकी कि त्रिशा और ईशा दोनों बेटियों को पढ़ा लिखा कर उनकी शादी ब्याह करके अपनी जिम्मेदारियों से कुर्ती बात की थी वह और रमेश दोनों आपस में सुख पूर्व रह रहे थे अपनी जिम्मेदारियों से छुट्टी आ चुकी थी और वह और रमेश दोनों आपस में सुख पूर्व कह रहे थे बड़ी बेटी त्रिशा की शादी को 8 वर्ष हो चुके थे। परंतु वह मां नहीं बन सकी थी अब इतने दिनों बाद कृत्रिम गर्भधान पद्धति से वह गर्भवती हुई थी डॉक्टर ने उसे पूर्ण विश्राम की सलाह दी थी उसकी देखभाल के लिए उसके घर में कोई महिला सदस्य नहीं थी इसलिए वीना का जाना आवश्यक था। लेकिन वह निश्चिंत ही क्योंकि उसे पार्वती पर तुम विश्वास था कि वह घर और रमेश दोनों की देखभाल अच्छी तरह कर सकती हैं। रमेश हमेशा से छोटे बच्चे की तरह थी के तरह थे अपने लिए एक कप चाय बनाना भी उनके लिए मुश्किल काम था पार्वती के रहने के कारण रीना बिना किसी चिंता के आराम से चली गई थी कुछ दिनों बाद तृषा के घर में प्यारी सी गुड़िया का आगमन हुआ वह खुशी से फूली नहीं समा रही थी रमेश की गुड़िया से मिलने आए थे वह दो-तीन दिन वहां रहे थे और चिर परिचित अंदाज में बैठे तृषा से बोले तुम्हारी मम्मी को मेरे लिए टाइम पास का अच्छा इंतजाम करके आना चाहिए था।


घर में बिल्कुल अच्छा नहीं लगता उनकी बात सुनकर सब हंस पड़े थे रीना शर्मा गई थी वह भी मैं से बोली थी आप भी बच्चों के सामने तो सोच समझ कर बोला करिए वह चुपचाप उठकर रसोई में चली गई थी मुंबई से वह 3 महीने तक नहीं लौट सकी त्रिशा की बिटिया बहुत कमजोर थी और उसे पीलिया भी हो गया था वह 10:00 12 दिन तक इंक्यूबेटर में रही थी तृषा के टांके भी शौक नहीं पा रही थी इसलिए वह चाहकर भी जल्दी नहीं लौट सके। उसका लौटने का प्रोग्राम कई बार बना और कई बार कैंसिल हुआ इसलिए आखिर में जब उसका टिकट आ गया तो उसने मन ही मन रमेश को सरप्राइज देने के लिए सोच कर कोई सूचना नहीं दी और बेटी तृषा को भी अपने पापा को बताने के लिए मना कर दिया दोपहर का एक बजा था। वह एयरपोर्ट से टैक्सी लेकर सीधी अपने घर पहुंची गाड़ी फोर्स में खड़ी देख कर उस उसका मन घबराए कि आज रमेश इस समय घर पर क्यों हैं वह दबे पांव घर में घुस गई। उसको बेडरूम से पार्वती और रमेश के खेल खिलौने की आवाज सुनाई दी वह अपने को रोक नहीं पाई उसने खिड़की से अंदर झांकने का प्रयास किया।


पार्वती बेड पर लेटी हुई थी यह देख सीना की आंखें शर्म से झुक गए पार्वती तो पैसे के लिए सब कुछ कर सकती है परंतु रमेश इतना गिर जाएगा वह भी इस उम्र में वह स्वपन में भी नहीं सोच सकती थी। आज रमेश को देखकर लग रहा था उनमें और जानवर में भला क्या अंतर है जैसे पशु अपनी भूख मिटाने के लिए यहां वहां कहीं भी मुंह मार लेता है वैसे ही पुरुष दी इतने दिन बाद कराने की उसकी सारी खुशी काफूर हो चुकी थी। उसके घर आने की खुशी काफूर हो चुकी थी उसे लग रहा था कि वह जलते हुए रेगिस्तान में अकेले झुलस कर खड़ी हुई है। दूर-दूर तक उसे सहारा देने वाला कोई नहीं है फिर भी अपने को संयंत्र करके उसने जोर से दरवाजा खटखटा दिया था जाने पहचाने आवाज रमेश जी की पार्वती दोनों देखो इस दोपहर में कौन मरा पार्वती अपनी साड़ी और बाल्टी करती हुई दरवाजे तक आई। उसने थोड़ा सा दरवाजा खोलकर ढाका रीना को देखते ही उसके होश उड़ गए रैना ने जोर से पैर मार कर दरवाजा पूरा खोल दिया। रमेश और बिस्तर दोनों अस्त व्यस्त थे वे पत्नी को अचानक सामने देख आश्चर्य से भर उठे थे अपने को संभालते हुए बोले तुमने अपने आने के बारे में कुछ बताया ही नहीं मैं गाड़ी लेकर एयरपोर्ट आ गया मैं तुम्हारी रंगरेलियां कैसे देख पाते तुम कैसी बात कर रही हूं कैसे देख पाती, तुम कैसी बात कर रही हो मुझे बुखार था इसलिए पार्वती से मैंने सिर दबाने को कहा था रमेश कुछ तो शर्म करो कि मियां की सीधी में आवाज में रमेश बोले तुम जाने क्या सोचता है ठीक हूं ऐसा कुछ भी नहीं है।


रीना मैं हिकारत से रमेश की और देखा था क्रोध में वह थरथर कांप रही थी उसने जोर से पार्वती को आवाज दी मां पार्वती व तुमने तो जिस थाली में खाना उसी मैसेज कर दिया मैंने तुम पर आंख मूंदकर विश्वास किया सब लोग तुम्हारे बारे में कितना कुछ कहते रहे लेकिन मैंने किसी को किसी की नहीं सुनी थी अभी यहां से निकल जाओ मैं तुम्हारा मुंह नहीं देखना चाहती रीना आज खुद को कोस रही थी क्यों पार्वती पर इतना विश्वास किया। वह ड्राइंग रूम में आकर चुपचाप बैठ गई थी थोड़ी देर में रमेश उसके लिए खुद चाय बना कर लाए उसके पैरों के पास बैठकर धीरे से बोले बिना प्लीज मुझे माफ कर दो। वह तो मैं बोर हो रहा था इसलिए टाइम पास के लिए उससे बातें कर रहा था रमेश तुम इस समय मुझे अकेला छोड़ दो आज मैंने जो कुछ अपनी आंखों से देखा है सहरसा उस पर विश्वास नहीं कर पा रही हूं प्लीज तुम मेरी नजरों से दूर हो जाओ मुझे एक बात बता दो यह सब कब से चल रहा है रीना तुम्हारी कसम खाता हूं ऐसा कुछ नहीं है। जो तुम सोच रही हो तो ठीक है जो बाकी है अभी करके अपनी इच्छा पूरी कर लो मेरा यहां रहने से परेशानी है तो मैं फिर से चली जाती हूं। तृषा को इस समय मेरी बहुत जरूरत है मैं तो तुम्हारे लिए भाभी आई थी परंतु तुम तो दूसरी दुनिया बसा चुके थे मैं बेकार में अपना माता खाली कर रही थी। व्यर्थ का तमाशा मत बनाओ मेरे सामने से हट जाओ घर में सन्नाटा छाया हुआ था। पार्वती की स्त्रियों की आवाज और सामान समेटने की आवाज बीच बीच में आ जाती थी घर उजड़ रहा था तभी ना दुखी थी।


उसे पार्वती से ज्यादा रमेश दोस्ती लग रहे थे वह मन ही मन सोच रही थी कि जब अपना सिक्का ही खोटा हो तो दूसरे को दोष क्यों दे कुछ भी हो पार्वती को यहां से हटाना आवश्यक है। वह उस घड़ी को पूछ रही थी जब उसने पार्वती को अपने घर पर काम करने के लिए रखा था लगभग 20 वर्ष पहले सुमित्रा जी ने पार्वती को उसके पास काम के लिए भेजा था। उसकी कामवाली भागवती हमेशा के लिए गांव चली गई थी। दो बेटियां पति और बूढ़ी अम्मा जी के सारे काम करते-करते उसकी हालत खराब थी उसे नई कामवाली की सख्त जरूरत थी सुमित्रा जी ने कह दिया था। पार्वती नहीं है इसलिए नहीं कहां रखना वह अतीत में खो गई थी पार्वती का जीवन तो उसके लिए खुली किताब है। 21- 22 वर्ष की पार्वती का रंग दूध की तरह सफेद था गोल चेहरा उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में  मेरी हत्था मेरी हफ्ता थी अपने में सिकुड़ी सिमटी हुई एक बच्चे की उंगली पकड़े हुए तो दूसरे को गोद में उठाए हुए कातर निगाहों से काम की यात्रा कर रही थी काम की याचना कर रही थी। उसे काम की सख्त जरूरत थी उसके माथे के जख्म को देखकर पूछ बैठी थी यह चोट कैसे लगी तुम्हारे पार्वती धीरे से बोली थी। मेरे आदमी ने हथियार फेंक कर मारा था वह माफी को छूता हुआ निकल गया था उसी से घाव हो गया ऐसे आदमी के साथ क्यों रहती हो। अब मैं उसे छोड़कर शहर आ गई हूं यहां नहीं हूं इसलिए ज्यादा किसी को जानती नहीं रीना को पार्वती पर दया आ गई थी। तुम्हारे बच्चे कहां रहेंगे वह पूछ बैठी जी जब तक कोटरी नहीं मिलती थी दोनों बरामदे में बैठे रहेंगे अम्माजी अंदर से बोली थी। इसको रखना बिल्कुल बेकार है तो दो बच्चे हैं सारे घूम घर में घूमते फिरेंगे रीना को रसोई के अंदर पड़े हुए ढेर सारे झूठे बर्तन याद आ रहे थे उसने पार्वती से बर्तन साफ करने को कहा उसने फुर्ती से अच्छी तरह बर्तन साफ किए। स्टैंड में लगाए प्ले और गैस साफ करके रसोई में पूछा भी लगा दिया था  उसके काम से बहन निहाल हो उठी थी धीरे-धीरे वह उसकी मोहित होती गई। बच्चे सीधे थे बरामदे में बैठे रहते थे मेरी बच्चों के पुराने कपड़े पहन कर खुश होते टूटे-फूटे खिलौनों से खेलते और बचा कुचा खाना खाते हैं पार्वती मेरे घर के सारे कामों को मन लगाकर करती थी।


मेहमानों के आने पर वह घर के कामों के लिए ज्यादा समय देती वह भी उसका पूरा ध्यान रखती तीज त्योहारों पर वह बच्चों के लिए नए कपड़े बनवा देती थी पार्वती भी रीना के एहसान तले दबी रहती थी वीना को अपना आत्मीय समझता है अपने दिल की बातें कह दी थी थी दो छोटे-छोटे बच्चों को पालना आसान नहीं था। पार्वती ने धीरे-धीरे आसपास के कई घरों में काम पकड़ लिया था कहीं झाड़ू तो कहीं बर्तन तो कहीं खाना बनाना है देखती थी कैसे चिड़िया अपनी सोच में पानी भरकर सीधा अपने घोसले में रूकती है वैसी ही वह कहीं से कुछ मिलता तो सब इकट्ठा कर के बच्चों के लिए ले आती थी। कपड़े मिलते तो उन्हें काट पीट कर बच्चों की नाप के बनाकर पहना थी उसकी  मेहनत से रीना बहुत प्रभावित हुई उसने अपनी पुरानी सिलाई मशीन उसे दे दी थी जिसे पाकर वह बहुत खुश थी पार्वती एक दिन महेश को लेकर आई थी। भाभी ने इसके साथ शादी करना चाहती हूं रीना उसे हिम्मत बांधते हुए बोली थी कि आदमी को अच्छी तरह जांच परख लेना कहीं पहले वाले की तरह दूसरा भी हाथ ना उठाने लगी है पार्वती ने खुशी-खुशी बताया था कि वह मेरे बच्चों को अपना आएगा। और वह पहले की तरह ही काम करती रहेगी आठ 10 दिन की छुट्टी लेकर चली गई थी रमेश को पता चला तो बोले गई भैंस पानी में वह तुम्हें धोखा दे गई। अब दूसरी ढूंढो इसके भी पर निकल आए हैं पार्वती अपने वादे की पक्की निकली वह 10 दिन बाद आ गई थी। परंतु यह क्या उसका तो रोज ही बदल गया था अब वह नई नवेली के रूप में थी लाल बड़ी सी बिंदिया उसके माथे पर सजी हुई थी फोटो पर गहरी लाल लिपस्टिक गोरे-गोरे पैर पायल बिछिया और महावर से सजे हुए थे हाथों में भर भर हाथ चूड़ियां और चटक लाल चमकीली साड़ी पहने हुए थी वह चेहरे पर शर्म की डाली थी रीना ने मजाकिया लहजे में उससे पूछा था। क्यों रे क्या मंडप से सीधे उठ कर चली आई है रमेश तो 1:00 तक उसको निहारते रह गए थे धीरे से बोली यह तो छम्मक छल्लो दिख रही है। वह तो बहुत खुश थी कि चलो इसके जीवन में खुशियों ने दस्तक तो दी जबकि आस-पड़ोस की महिलाओं को घोषित का एक नया विषय मिल गया था काश उस दिन  मैसेज गुलाटी की बात रीना मान लेती उन्होंने उसे सावधान करते हुए कहा था।


इससे सावधान रहिएगा यह बच्चन औरत है इसके संबंध कई आदमियों से हैं शोभा जी ने नहले पर दहला मारा था यह बहुत बदमाश औरत है हम लोगों से साड़ी सूट मांग कर ले जाती है और अपनी झुग्गी पर जाते ही बेच देती है। रीना तल्खी से बोली थी इन बातों से उसे क्या मतलब है उसका काम है ठीक से करती है बस इतना काफी है। पार्वती ने अपने बच्चों के लिए ख्वाब पाल रखे थे दोनों बच्चों का स्कूल में नाम लिखा दिया था महेश से शादी के बाद बच्चों से उसका ध्यान बटने लगा था। वह बच्चों को स्कूल और ट्यूशन भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ बैठी थी। दोनों स्कूल जाने का बहाना करके इधर उधर घूमा करते थे बेटा दीप पान मसाला खाता पैसा चुराकर जुआ खेलता बेटी पूजा चाल के लड़कों से नजरें लड़ाती।


दोनों बच्चों की वजह से उसके और महेश के बीच अक्सर लड़ाई हो जाती महेश दे नकली चेहरा उतारकर खूब शराब पीने लगता था एक दिन वह पूजा को लेकर आई थी बोली यह दिन भर आपके पास रहेगी तो चार अच्छी बातें सीख लेगी पूजा को देखते हुए उसे काफी दिन हो गए थे वह जींस कुर्ती पहन कर आई थी। उसके कानों में बड़े-बड़े कुंडल थे वह स्वयं उस खूबसूरत परी को एकटक देखती रह गई थी वह हाथ में मोबाइल पकड़े हुए थे। उसका मोबाइल थोड़े-थोड़े अंतराल में बसता रहा। वह कमरे से बाहर जाकर देर देर तक बातें करती रही वह समझ गई थी कि पूजा का किसी के साथ चक्कर चल रहा है। उसने पार्वती को आने वाले खतरे के लिए आगाह कर दिया शायद वह भी उन बातों से वाकिफ थी उसने महेश की सहायता से आनन-फानन उसकी सगाई करवा दी थी पार्वती खुश होकर लड़के वालों के द्वारा दिया हुआ सोने का हार उसे दिखाने भी लाई थी।


उसने इशारों में उससे ₹10000 की फरियाद दी कर दी थी रमेश ने उनसे रुपए देने के लिए हां कर दी थी अम्मा जी के कान में भनक लग गई थी वेनाराज हो उठे थे क्योंकि उन्हें पार्वती फूटी आंख नहीं सुहाती थी जबकि सबसे ज्यादा काम वह उन्हीं का करती थी उनको रोज नहला धुला कर उनके कपड़े धोती थी उनके बाल बनाती थी। रोज उनके पैरों में मालिश किया करती थी उनकी नजर में वह बदचलन औरत थी काश उस समय वह उनकी बातों पर ध्यान दे देती तो आज उसे यह दिन ना देखना पड़ता तमीज और उसके डर से अम्माजी उसे भगा नहीं पाती थी वरना वे उसे 1 दिन ना रुकने देती कुछ ही दिनों में पता चला कि पूजा अपने प्रेमी के साथ बहस सोने का हार देखकर रफूचक्कर हो गई। पार्वती के रोने धोने के कारण महेश ने शादी के लिए जुड़े हुए रुपए लड़के वालों को देखकर किसी तरह मामले को ने बताया था। परंतु बिरादरी में वह उसकी बदनामी तो बहुत कर गई थी साल भर बाद जब पूजा के बेटी हुई तो भागती हुई सबसे पहले वह बेटी के पास पहुंची थी। यहां वहां भागकर चांदी के कड़े खरीद लाई थी और  पांच   6 फ्रॉक भी खरीद लाई थी उसकी आवाज और चेहरे से  खुशी छलक रही थी बोली थी भाभी हम नानी बन गए हैं वह है तो मेरी ही नातिन उसने पार्वती को ₹500 का नोट पकड़ा दिया था.


उसे याद आया था कि जब ईशा के बेटा हुआ था तो वह कितनी खुश हुई थी। रमेश ऑफिस से आ गया आ गए थे। उन्होंने उसे रुपए देते हुए देख लिया था वह बोले यह बहुत चालू है तुम्हें बेवकूफ बनाकर अपना मतलब सीधा करती है मैं बोल पड़ी थी रहने भी दीजिए जरूरत के समय वह हमेशा हाजिर रहती है यह नहीं देखते आप ठीक है। यह तुम्हारी दुनिया है जो ठीक समझो वह करो इधर महेश दूसरी औरत के चक्कर में पड़ गया था वह रोज शराब पीने लगा था। वह भी करते रात में आता और हंगामा करता अक्सर पार्वती पर हाथ भी उठाने लगा था पार्वती शुद्ध और अनमणि रहने लगी थी 1 दिन रमेश बीना से बोले थे। तुम्हारी छम्मक छल्लो आजकल चुपचाप रहती है शायद किसी परेशानी में है पूछ लो उससे यदि पैसों की जरूरत हो तो दे दो नहीं पैसे की बात नहीं है महेश और दीप दोनों शराब पीने लगे हैं महेश किसी दूसरी औरत के चक्कर में भी पड़ गया है। रमेश आचार्य से बोले थे इतनी सुंदर और सली केदार औरत होने के बावजूद वह दूसरी पर मुंह मार रहा है इधर काम पर आती थी उधर महेश की प्रेमिका उसके घर पर आ जाती थी धीरे-धीरे उसकी हिम्मत पड़ गई थी वह उसके घर में ही अपना हक जताने लगी थी यदि वह कोई शिकायत करती तो महेश पार्वती की पिटाई कर देता था। पार्वती किसी भी तरह अपने और महेश के रिश्ते को बचाना चाहती थी जब उसका नशा उतर जाता था।


तो वह पार्वती के पैरों में गिर कर माफी मांगने लगता था वह पिघल जाती थी यह सिलसिला काफी दिन से चल रहा था वह अपनी परेशानियों से मैं उलझी हुई थी। इधर दीप भी आवारा लड़कों के साथ चोरी जुआ शराब आदि का शौकीन बन गया था पार्वती के यहां वहां से पाए हुए पैसे वह चुपचाप गायब कर लेता था और महेश का नाम लगाकर घर में महाभारत मचवा देता था एक बार उसके नए मोबाइल को देखकर उसने पूछा था तो बोला हमारे मालिक ने हमें इसे ठीक करवाने के लिए दिया है। एक दिन अतीत के पन्ने रुपयों की गद्दी को देख उसका माथा ठनका था। परंतु दीप ने उसे पट्टी पढ़ाती थी वह भी ममता की मारी बुलावे में आ गई थी परंतु एक दिन वह चाल की एक लड़की को फुसलाकर ले भागा था। लड़की नाबालिक कि उसके पिता ने पुलिस में शिकायत कर दी पुलिस ने महेश और पार्वती को थाने में ले जाकर पिटाई की और 2 दिन के लिए बंद कर दिया था। चार-पांच दिन के अंदर पुलिस ने टीम को ढूंढ निकाला था। नाबालिक लड़की को भागने के जुर्म में 30 को जेल में बंद कर दिया था महेश की प्रेमिका माधुरी ने अपनी कोशिशों से महेश को छुड़ा लिया था।


पुलिस ने पार्वती को भी छोड़ दिया था अब महेश का घर उसके लिए पराया हो चुका था। उसकी साउथ माधुरी का हक महेश और उसके घर दोनों पर हो गया था पार्वती लुटी पिटी रीना के पास पहुंची थी। उसका रोना भी लगना देखकर उसका दिल निकला उठा था रमेश के लाख मना करने पर भी उसने पार्वती को घर पर रख लिया था। वह बहुत खुश थी रीना को पार्वती के घर पर रहने से बहुत आराम हो गया था वह उसके घर बाबा कार के सारे काम करती थी। उसको यहां रहते हुए लगभग 2 साल हो गए थे अक्सर में अपने बच्चों और महेश को याद करके आंसू बहाने लगती थी यह देख सीना का दिल पिघल उठता था। आज किसी पार्वती की वजह से उसके घर का सुख चैन लूट गया था शाम ढल चुकी थी। कमरे में अंधेरा छाया हुआ था उसे बिजली जलाने का भी होश नहीं था आज उसके जीवन में ही अंधकार छा गया था वह जब से यहां आई उसने मुंह में पानी की एक बूंद भी नहीं डाली आज वह बहुत अतिथि जीवन से निराश होकर उसका मन फूट-फूट कर रोने को हो रहा था।


रमेश की आवाज से वह वर्तमान में लौट आई थी पर उसे मोबाइल देकर वो ले लो तृषा का दो बार फोन आ चुका है कह रही है क्या बात है मां का फोन स्विच ऑफ आ रहा है। उनकी तबीयत तो ठीक है सुबह यहां से गई थी। तब तो बिल्कुल ठीक थी उनको फोन कीजिए फिर मुझसे बात करें गुड़िया बहुत रो रही है रीना की हेलो बोलते ही तृषा गीत कर बोली थी। क्यों मां बापा मिल गई तो मुझे और मेरी गुड़िया सबको भूल गई कम से कम पहुंचने की खबर तो दे देती रीना अपनी बेटी को शांति दे यथासंभव अपनी आवाज को सामान्य करती हुई बोली थी ना बेटा फ्लाइट में फोन बंद किया था और उसे ऑन करना ही भूल गई थी गुड़िया को गिनती पिला दो और उसके पेट पर ही मार दो पेट दर्द से रो रही होगी। उसने फोन काट दिया था। सामने खड़े रमेश का मुंह उतरा हुआ था वे हाथ जोड़कर उससे बेटी को कुछ ना बताने और कान पकड़कर माफी का इशारा कर रहे थे रीना कशमकश में थी क्या उसका और रमेश का इतना पुराना रिश्ता पल भर में टूट जाएगा। वह सिर पर हाथ रखकर चिंतित मुद्रा में ही बैठी थी हमें अपने अनगढ़ हाथों से सैंडविच और दूध बना कर लाए थे ना तुम मुझे जो चाहे वह सजा दे दो। लेकिन प्लीज पहले यह सैंडविच खा लो रीना को याद आया कि रमेश तो डायबिटिक है प्ले कई घंटों से उन्होंने कुछ नहीं खाया।


रमेश बोले थे उन्हें दो-तीन दिन से बुखार आ रहा था आज सुबह से मेरे सिर में बहुत दर्द भी हो रहा था। इसलिए नाश्ता भी नहीं किया अब रीना ने सिर उठाकर रमेश पर भरपूर ने घर डाली तो वे काफी कमजोर देख रहे थे। उनका मासूम चेहरा डरे हुए बच्चे की तरह लग रहा था सब कुछ भूल कर उसका दिल कसक उठा था यदि रमेश को कुछ हो गया। तो उसने चुपचाप सैंडविच उठा ली थी रमेश ने सिर झुकाकर सैंडविच और दूध पी लिया था रात दिन मजाक करने वाले हंस और रमेश को चुप और गुमसुम देख उसे अटपटा लग रहा था परंतु आज वह मन ही मन एक निश्चय कर चुकी थी। वह आहिस्ता आहिस्ता अलमारी से अपना सामान हटाकर दूसरे बेडरूम में ले जा रही थी वह रमेश की परछाई से भी इस समय दूर जाना चाह रही थी। रमेश जी उदास और पनीर की आंखें चारों तरफ उसका पीछा कर रही थी ना दुनिया में बिल्कुल अकेली हो चुकी थी। जहां कोई ऐसा नहीं था जिससे वह अपने दर्द को कहकर अपना मन हल्का कर सके उसे घुटन महसूस हो रही थी। उसको अपनी दुनिया सुनी और वीरान लग रही थी पीछे से रमेश की धीमी सी आवाज उसके कानों में पड़ी थी। यार तुम्हारे बिना मेरा टाइम पास कैसे होगा आज उस के बढ़ते कदम नहीं रुके थे वह रमेश को अनदेखा करके दूसरे बेडरूम की ओर चल पड़ी थी 


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