बुधवार, 23 सितंबर 2020

बेपरवाह

 दिखे हम बेपरवाह सजाए पलकों पर आंसु रुके हुए थके हुए वीरान कोने में बैठे हैं।


पास बहुत कुछ है बयां करने को आज बस अल्फाज नहीं है।


हुई क्या नाराज जिंदगी जो ख्वाब बनकर रह गई,


मंजिले अपनी किया था वादा वक्त से साथ चलने का,


मगर वही वक्त आज छोड़ चला है।


शीशा कर लेता है प्रेम पत्थर से,


बहुत पर उसी पत्थर से चोट भी खाता है,


उस पाषाण को फर्क पड़ता नहीं मगर शीशा तो टूट जाता है।


शीशे जैसे ही हैं अरमान ढूंढते हैं दोस्तों को पर हर कोई पत्थर लिए नजर आता है, 


दिखे हम बेपरवाह कितनी भी मगर पाषाण सा कठोर भी नीर से टूट जाता है।


तूफान चाहे ताउम्र हो या घड़ी भर का घरौंदा तो आखिर बिखर ही जाता है 


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