सोमवार, 8 जून 2020

वट सावित्री...

प्रकृति के महत्व को दर्शाती एवं वृक्ष में भी चेतनता का अहसास दिलाती हमारी सँस्कृति तुलसी पूजन, पीपल पूजन, वट पूजन, आँवला पूजन, आदि आदि विभिन्न पूजन व अन्य विधानों के द्वारा..
हमारी भावना को एकाग्र कर साकारत्मक आंतरिक ऊर्जा को घनीभूत कर उसमें आकर्षण का गुण उतपन्न करना, आकर्षण का गुण विशुद्ध प्राकृतिक गुण है।
यह योग, साधना व अन्य अभ्यासों से उच्च से उच्च अवस्था को प्राप्त होती रहती है।
तो...
सामान्यतया यह जो पूजन आदि प्रक्रिया में भावनाओ के घूर्णन से  जो आकर्षण शक्ति उतपन्न हुई जो तरंगे निकलीं वो उस प्रकृति से जो अथाह ऊर्जा से ओतप्रोत है जिसे आकर्षण का गुरु-तत्व अपने वृहदरूप मे विराजित है उससे स्वयं की आवश्यकता और कामना की दृष्टि से श्रद्धा अनुसार खींच कर भर लेती है। या उससे संयुजन हो जाने से शक्तिशाली हो  अपनी कामनाओं की पूर्ति कर लेती है। 
इसे आंतरिक ऊर्जा का रूपान्तरण कर प्राकृतिक ऊर्जा से संयुजन कर अपनी कार्य सिद्धि का पुराना विज्ञान समझिये।
आवश्यकता है..
चुम्बकीय ऊर्जा स्वयं में बनने या बनाने की।
इसके लिए आवश्यक्ता है श्रद्धा और विश्वास की।
इससे जो तरंग शक्ति निकलती है वो दिखाई तो नही देती किन्तु..
वह अपने उद्देश्य को उसी तरह से खींच लेती है जैसे कि लोहे को चुम्बक।
यह शक्ति जिसमें इसतरह के चुम्बकीय गुण हैं, वह ही है भावना...
यह खींचती है।
कृष्ण की तरह अपनी ओर खींचती है।
यह भक्ति से भाव से इतनी प्रबल हो सकती है कि सबको खींचने वाले कृष्ण को भी खींच लेती है।
यह इस भावना की क्षमता पर निर्भर करता है।
कहा भी गया है-
'यादृशी भावना यस्य, सिद्धिर्भवति तादृशी ।।'


तो... जैसी भावना होगी वैसी सिद्धि होगी।
यह भावना भी निर्भर करती है श्रद्धा और विश्वास पर जो कि शिव पार्वती हैं या यह कहिए प्राकृतिक रूप से अणु विज्ञान के मूल तत्त्व है।
बहुत ही सूक्ष्मतम व गूढ़ विज्ञान है सनातन का विज्ञान।
जो वस्तुतः वैज्ञानिक हैं जिन्होंने आधुनिक विज्ञान को एक दिशा दिया, वो विज्ञानी भी भारत के इस विज्ञान का अनुसंधान करते रहते हैं व इसका अपने ढंग से अध्ययन करते हैं। 
चूंकि हम भारतीय स्वयं अपने विज्ञान को विज्ञान की दृष्टि से न देखकर पोंगापंथी व बेकार की परंपरा समझ उपेक्षा करते हैं सो हम इसे नही समझ पाते। 
इसके पीछे उन्ही पश्चिमी चिंतकों का हाथ है जिन्होंने हमसे ही हमारी चीज को बेकार बताया और स्वयं उसपर शोध कर उसे अपने नए रंग रूप दे प्रदर्शित किया।
जैसे आप ही कभी कोई चीज खरीदने निकलते हैं तो जिस वस्तु की चाह आपको होती है और वह वस्तु किसी अन्य के पास हो तो आप उस वस्तु की महत्ता को कम कर के बताते हैं जिससे वह सस्ती मिल जाये अथवा कोई चतुर हो तो वह उस वस्तु को इतना बेकार बता देगा कि अगला उसे व्यर्थ समझ घूर में डाल देगा।
अब घूर में पड़ी वस्तु जिसके मतलब की होगी वह अवसर देख उसे ले लेगा।
यही हुआ है अभी तक हमारी मान्य परम्पराओं और शास्त्रीय पद्धतियों व संकल्पनाओं के साथ।
एक बात तो माननी ही पड़ेगी कि  संस्कृति की रक्षा अपने भारत में माताओं ने अथवा जिन्हें हम मूर्ख और ढपोरशंख समझते हैं उन्होंने ने ही जाने-अनजाने परम्परा या देखा देखी अथवा सामाजिक भय या अपनी कामनाओं के चलते कर रखी है।
कोई पर्व हो, उत्सव हो, व्रत हो, संस्कार हो, यह सब माताओं व कुछ ऐसे लोग जिन्हें इसकी वैज्ञानिकता-एज्ञानिकता से कोई लेना देना नही , उन्ही के दम पर होता है और यह पीढ़ी दर पीढ़ी यूँ ही बढ़ता चलता है। कभी कोई वैज्ञानिक समझ का व्यक्ति हुआ तो उसने उसमे से आवश्यकता के अनुरूप अनुसंधान कर मूल अर्थ को तत्त्व को प्राप्त कर जन जन के लिए उपलब्ध करवा देते हैं।
तो....
आज बरगद की पूजा है।
इसे सनातन समाज मे शिव स्वरूप मानते हैं। शिव अर्थात कल्याणकारी।
आप भी खोजिए क्या कारण है कि वट को कल्याणकारी माना गया।
केवल हँसी ही उड़ाएंगे या कोई सार्थक पहल भी करेंगे।
या कोई दूसरा जब ढूँढ़ कर लाएगा तब आप उसके गुण गाने को ही बैठे हो?
आज इतनी चोट खाकर भी, यदि सनातन धर्म के ये ग्राम्य अंश पूर्णतः प्राणयुक्त हैं तो निःसन्देह इसका कोई रहस्य है कोई अदृश्य शक्ति इस महत्व को बनाये रखे है।
नमन है उस शक्ति को।
नमन है इन परम्पराओं को जीने वाली सँस्कृति को।
नमन है हमारी माताओं बहनों को।
श्री नारायण हरिः..... आत्मचैतन्य।।


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