सोमवार, 8 जून 2020

हस्तप्रक्षालन के आधुनिक मानक वैज्ञानिक और तर्कसंगत हैं या उपरोक्त प्राचीन भारतीय अवधारणा?

कोरोनाकाल में हस्तप्रक्षालन के अंतरराष्ट्रीय मानकों की विश्वव्यापी चर्चा है। इन मानकों का सर्वनिष्ठ निष्कर्ष है कि -
अल्प अन्तराल में किसी भी शोधकपदार्थ से न्यूनतम २० सेकंड तक हाथों को प्रक्षालित करें। मुख का यथासंभव हस्तस्पर्श न करें।



विदेश के किसी संक्रमणग्रस्त महानगर से हाल ही में एक समाचार आया था कि हस्तप्रक्षालन की बारंबारता के फलस्वरूप वहां जलसंकट उत्पन्न हो गया है। सामान्य बुद्धि का आश्रय लेकर इन मानकों का वैज्ञानिक परीक्षण अपेक्षित है।
यह तथ्य असंदिग्ध है कि हस्तप्रक्षालन का उद्देश्य संचित मल का निवारण है। मल के निवारण हेतु शोधकपदार्थ और जल की गुणवत्ता महत्वपूर्ण कारक हैं। इन दोनों कारकों की गुणवत्ता ही यह निर्धारित करेगी कि प्रक्षालन की अवधि क्या होनी चाहिए। बारंबार हस्तप्रक्षालन की अनिवार्यता के कारणों को इन मानकों में स्थिर नहीं किया गया है। निश्चित रूप से प्रक्षालन की बारंबारता  मलसंचय की आवृत्ति पर निर्भर करेगी। सामान्य बुद्धि का निष्कर्ष पारदर्शी है- इन मानकों में कुछ भी वैज्ञानिक और तर्कसंगत नहीं है।



अब मैं प्राचीन भारतीय मनीषा की एतद्विषयक अवधारणा को उद्धधृत करना चाहता हूं। आयुर्वेद में मुख, हस्तपादादि के शोधनार्थ 'आचमन ' शब्द का प्रयोग किया जाता है। अष्टांगसंग्रह में आचमन की विधि का विधान करते हुए आचार्य वाग्भट कहते हैं-



स्पृष्ट्वा धातुमलानश्रु दृशं केशनखांश्च्युतान्।
स्नात्वा भोक्तुमना भुक्त्वा सुप्त्वा क्षुत्वा सुरार्चने।
रथ्यामाक्रम्य चाचामेत् उपविष्ट: उदंमुख:-----
भावार्थ- आचमन निम्न अवस्थाओं में करना अभीष्ट है-
धातुमलों का स्पर्श करके अर्थात् शरीर  से निकले सप्त धातुमलों ( रस , रक्त ,मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र), मूत्र, पुरीष का स्पर्श करने के उपरांत।
अश्रु, आंख, कटे हुए केश व नखों का स्पर्श करने के उपरांत।
स्नान, भोजन के पूर्व और पश्चात, सोकर उठने के बाद, छींक के बाद ।
देवाराधन के बाद।
मार्ग चलने के बाद।
स्पष्टतया उन समस्त परिस्थितियों का उल्लेख है जहां मलसंचय की संभावना है।
जल की गुणवत्ता निम्नवत् होनी चाहिए-



स्वच्छै: अर्थात् स्वच्छ
नाग्निपक्वैर्न पूतिभि: अर्थात् अग्नि पर पकाया गया नहीं, दुर्गंधयुक्त नहीं।
न फेनबुद्बुदक्षारै: अर्थात् 
झाग और बुलबुले युक्त नहीं।
 अब
सुधीजनों के विचारार्थ एक प्रश्र उपस्थित है-


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