भारत शक्ति पीठो का देश है। हर पीठ का अपना महत्व है । आज भी इन पीथो पर पूजा के लिए हजारों भक्त दूर दूर से आते है।आयिए जानते है इनका रूप,पौराणिक कथा एवम् भक्ति।
वर्तमान त्रिपुरा प्रदेश पुराणोक्त “त्रिपुर” का ही एक लघु भाग है। इसकी प्रथम विजय का श्रेय रुद्र को दिया जाता है। इस विजय के कारण ही वे “त्रिपुरारि” कहलाए। पौराणिक परम्परा है कि प्राकृतिक सीमाओं से ही सीमांकन हुआ करता है, अत: त्रिपुर की सीमाएँ भी प्राकृतिक थीं। यह पूर्व में वर्तमान मणिपुर व मिजोरम प्रदेशों तक, उत्तर में वर्तमान मेघालय प्रदेश की दक्षिणी सीमा तक, पश्चिम में ब्रह्मपुत्र नद (स्थानीय जमुना) तक और दक्षिण में समुद्र पर्यन्त विस्तृत था।
भारत के त्रिपुरा प्रदेश की सबसे रोचक बात यह है कि इसका उत्तर-दक्षिण विस्तार २५° से २२° उत्तर अक्षांशों के मध्य है जो उत्तरायणान्त रेखा (अथवा पृथ्वी के अक्ष की नति) के विचलन की अधिकतम व न्यूनतम सीमाएँ हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि त्रिपुर का उक्त नाम उन तीन पुरों के कारण पड़ा जो उत्तरायणान्त रेखा के विचलन की उत्तरी सीमा पर, मध्य में व दक्षिणी सीमा पर थे। वे तीन पुर थे –
१. उत्तरपुर (वर्तमान महेन्द्रगंज के निकट)
२. मध्यपुर (वर्तमान मुंशीगंज के निकट)
३. दक्षिणपुर (वर्तमान चिट्टगाँव)
उत्तरपुर गारो पर्वत के दक्षिण में था। मध्यपुर पद्मा नदी (गंगा व ब्रह्मपुत्र की संयुक्त धारा) व मेघना नदी के संगम पर था। सम्प्रति मध्यपुर व दक्षिणपुर बांग्लादेश में पड़ते हैं। तीनों पुर व्यापार व विद्या के केन्द्र थे।
त्रिपुर के उत्तर में “कामरूप” है। वर्तमान अरुणाचल प्रदेश, असम व मेघालय पुराणोक्त कामरूप के उत्तरी, मध्य व दक्षिणी भाग हैं जिनमें मध्य भाग प्रधान था। वर्तमान नागालैण्ड प्रदेश कामरूप का पूर्वी सीमान्त भाग था।
त्रिपुर व कामरूप में विन्ध्य प्रदेश के अवन्ति की ही भाँति ज्योतिषीय केन्द्र थे। कामरूप का प्राग्ज्योतिषपुर ऐसा ही एक केन्द्र था। महाभारत युद्ध के समय यहाँ भगदत्त नामक राजा का शासन था। समस्त पूर्वी क्षेत्र के राजा भगदत्त को अपना नेता मानते थे अथवा भगदत्त के अधीन ही थे। महाभारत युद्ध के पूर्व युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया था जिसकी पूर्ति हेतु अर्जुन, भीम, नकुल व सहदेव ने क्रमश: उत्तर, पूर्व, पश्चिम व दक्षिण दिशा में विजय-अभियान किया था। अर्जुन के प्राग्ज्योतिषपुर पहुँचने पर उनका भगदत्त के साथ भीषण युद्ध हुआ। भगदत्त की विशाल सेना में किरात, चीन व समुद्र तट के योद्धा सम्मिलित थे। ८ दिनों तक युद्ध होता रहा किन्तु भगदत्त अर्जुन को परास्त न सके। अन्त में भगदत्त ने सन्धि का प्रस्ताव किया और राजसूय यज्ञ के लिए कर देना स्वीकार कर लिया। महाभारत युद्ध में पाण्डव पक्ष में भगदत्त भी सम्मिलित थे।
स तानपि महेष्वासान् विजिग्ये भरतर्षभ ।
तैरेव सहित: सर्वै: प्राग्ज्योतिषमुपाद्रवत् ॥
तत्र राजा महानासीद् भगदत्तो विशाम्पते ।
तेनासीत् सुमहद् युद्धं पाण्डवस्य महात्मन: ॥
स किरातैश्च चीनैश्च वृत: प्राग्ज्योतिषोऽभवत् ।
अन्यैश्च बहुभिर्योधै: सागरानूपवासिभि: ॥
तत: स दिवसानष्टौ योधयित्वा धनञ्जयम् ।
प्रहसन्नब्रवीद्राजा संग्रामविगतक्लमम् ॥
(महाभारत, सभापर्व २६ - ७ से १०)
कामरूप में कामाख्या शक्तिपीठ है तथा त्रिपुर में त्रिपुरसुन्दरी नामक शक्तिपीठ है।
“चिन् पर्वत” त्रिपुर व कामरूप दोनों की पूर्वी प्राकृतिक सीमा बनाता था। हिमालय के पूर्वी शीर्ष से समुद्र (बंगाल की खाड़ी) पर्यन्त विस्तृत पर्वतशृङ्खला को “चिन्” अथवा “ची” कहा गया था। सम्प्रति यह पर्वतशृङ्खला “अराकानयोमा” कहलाती है। इसी पर्वतशृङ्खला के उत्तरी भाग में भारत के नागालैण्ड व मणिपुर प्रदेश हैं। मणिपुर के दक्षिण में स्थित पहड़ियाँ अब भी “चिन्” ही कहलाती हैं जो अब म्यान्मार की सीमा में पड़ती हैं। पहले ये पहाड़ियाँ त्रिपुर प्रदेश के अन्तर्गत थीं।
इन्द्रप्रस्थ (अन्य नाम ⇒ शक्रप्रस्थ, शक्रपुर, शकरपुरी, दिल्ली आदि) से चिन् (अराकान) पर्वत की ओर की दिशा “प्राची” तथा उसके विपरीत वाली दिशा “प्रतीची” कहलाई। इसी प्रकार हिमालय की ओर की दिशा “उदीची” कहलाई। चिन् पर्वत के पूर्व में स्थित भूभाग को सम्प्रति म्यान्मार कहा जाता है। महाराज पूरु के पुत्र जनमेजय (भारत युद्ध के पूर्ववर्ती) के पुत्र ने इसे जीता था। इस कारण उनका नाम “प्रचिन्वान्” पड़ गया था।
पूरो: पुत्रो महावीर्यो राजाऽऽसीज्जनमेजय: ।
प्रचिन्वांस्तु सुतस्तस्य य: प्राचीमजयद्दिशम् ॥
(हरिवंश पुराण, हरिवंश पर्व ३१-५)
आज भी कामाख्या का उंतना ही महत्व है ।उसके प्रसाद के लिए संत,महात्मा,तंत्र योगी,और साधक दूर दूर से जाते है। और घंटो मंत्रो का उच्चारण करते रहते है।
आज इस महामारी मै मा के आशीर्वाद की हम सबको जरूरत है।
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