पिछले साल गल्फ देशों में रहने वाले भारतीय मजदूरों ने करीब 50 अरब डॉलर अपने घर भेजे थे। ये भारत को सालाना विदेशों से भारत आने वाले कुल पैसों का 40% है। कंस्ट्रकशन, टूरिज़्म ,हॉस्पिटेलिटी, रिटेल, ट्रांसपोर्ट और सर्विस जैसे सभी सेक्टरों में काम कर रहे ये भारतीय मजदूर गल्फ देशों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी हैं। लेकिन, कोविड-19 की चपेट से सब काम ठप्प पड़ा है। इनके रोजगार पर अनिश्चित्ता के घने बादल मंडरा रहे हैं। ज्यादातर लोगों को बिना सैलरी के छुट्टी पर भेज दिया है। कइयों की नौकरी भी जा चुकी है।
भारत में 3 मई तक लॉकडाउन है। लिहाजा ये वतन भी वापस नहीं आ सकते। कुछ लोग मदद के लिए ट्वीट कर रहे हैं। हालांकि, मोदी सरकार का कहना है कि वह एंबेसी या कॉन्सुलेट के जरिए विदेशों में फंसे अपने लोगों की मदद करने और उन्हें सुविधा देने का काम कर रही है। लेकिन फ़िलहाल खाड़ी समेत दूसरे बाहरी देशों से भारतीयों को वापस सरकार नहीं लाने वाली है। सुप्रीम कोर्ट ने भी एक महीने तक उन याचिकाओं पर सुनवाई करने से मना कर दिया है, जिसमें गल्फ देशों में फंसे भारतीयों को देश वापस लाने की मांग की गई है।
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