शाहीन बाग और नागरिकता कानून पर भी केजरीवाल पूरी तरह मौन साधे रहे। उन्होंने बड़ी चालाकी से कांग्रेस को ही इस मुद्दे पर आगे रहने दिया। शाहीन बाग पर तो वह एक बार भी नहीं बोले। भाजपा के लाख उकसावे के बाद भी वह चुप ही रहे। अगर दो साल पहले का वक्त होता तो वह शाहीन बाग धरनास्थल तक जरूर पहुंचते, लेकिन इस बार उन्होंने बयान तक नहीं दिया। शायद उन्हें पता था कि आक्रामक तरीके से केंद्र सरकार और भाजपा का विरोध कर रही कांग्रेस ही उन्हें (आप) फायदा पहुंचाएगी। अब नतीजों को देखकर भी कुछ ऐसा ही लग रहा है।
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